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बुधवार, 17 दिसंबर 2014

गणेश मानस पूजा

(२९.) सभा संचालन एवं विसर्जन- 
गणेशजी सभी भक्तजनों से मुस्कुराते हुए उनकी कुशलक्षेम पूछ रहे हैं और उन्हें उनकी समस्याओं के सुंदर हल बता रहे हैं और अपने वचनों द्वारा उन्हें संतुष्टि एवं शांति प्रदान कर रहे हैं। प्रभु के वचन कर्णों में अमृत घोलने वाले हैं और हृदय की समस्त व्यथा को दूर करने वाले हैं। ब्रह्माजी अपने हंस पर बैठे गणेशजी को आज का पंचांग सुना रहे हैं। समस्त देवगण, देवांगनाएँ, ऋषि-मुनिजन, गंधर्व, एवं अप्सराएँ गणेशजी को प्रणाम कर विदा ले रहे हैं और गणेशजी उन्हें मुस्कुराते हुए अभय मुद्रा द्वारा अपने आशीर्वचन प्रदान कर रहे हैं


मैं गणेशजी एवं ऋद्धि-सिद्धि माता के चरण धोने में एवं नहाने में प्रयुक्त जल के शेष भाग को अमृत की भाँति पान कर रहा हूँ मैं उनके ऊपर बरसाए गए एवं उनकी पुष्पमाला के पुष्पों की मीठी-मीठी एवं भीनी-भीनी सुगंध को सूँघते हुए उन्हें अपने शीश पर धारण करता हूँ मैं उनके शेष बचे शीतल चंदन को अपने शरीर पर लगाता हूँ और उनके बचे स्वादिष्ट भोजन, मिष्ठान्न एवं पान को ग्रहण कर आनंदित हो रहा हूँ


हे संकटहरण गणपति! मैं आपके अंग-प्रत्यंग की शोभा को अपने नेत्रों से निहार रहा हूँ आपके चरण, गुल्फ (एड़ी), टखने, जघन, उरु, कटि, नाभि, हृदय, हाथ, भुजा, स्कंध, कंठ, चिबुक, ओष्ठ, दंत, नासिका, गाल, नेत्र, ललाट, कान, शीश, केश सभी सौंदर्य के सागर हैं और उनमें प्रत्येक व्यक्ति के नेत्रों को खींचने एवं हृदय को घायल करने की क्षमता है 

मैंने अपना शीश आपके शांतिप्रदाता चरणकमलों में टिका दिया है और आप अपने कोमल करों से मेरे शीश को सहला रहे हैं मेरी आँखों से अश्रुओं की धारा बहते हुए आपके चरणों को धो रही हैं



कुछ क्षण पश्चात् मैं अपना मस्तक ऊपर उठाकर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि श्रीगणेशजी दोनों माताओं के संग मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं सहसा गणेशजी ने मुझे अपनी सूंड से उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया है और वक्ष:स्थल से लगा लिया है वे मुस्कुराते हुए अपने कोमल करों से धीरे-धीरे मेरे सिर पर फेरते हुए मेरे बालों को सहला रहे हैं गणेशजी के शरीर की सुगंध से मेरे हृदय में प्रेम की हिलोरें उठ रही हैं प्रभु के आलिंगन से एवं उनके शरीर के स्पर्श से मुझे अत्यंत आनंद और रोमांच का अनुभव हो रहा है और मेरे नेत्रों में प्रेम और हर्ष के अश्रु भर आए हैं



Ganesh Manas Puja 29. Ganesha in His royal court 
गणेश मानस पूजा


(२४.) स्तोत्र स्तुति- 
हे करुणावतार! मैं आप चतुर्भुजधारी श्रीगणेश का ध्यान करता हूँ, जो त्रिनेत्र और एकदंत हैं, गजमुख और लंबोदर हैं, सर्प का यज्ञोपवीत धारण किए हुए हैं, जिनके चरणकमलों की असंख्य देवगण वंदना कर रहे हैं, जो अपनी अतिसुंदर मुख वाली पत्नियों ऋद्धि एवं सिद्धि के संग मुस्कुराते हुए स्वर्ण के सिंहासन पर विराजमान हैं। 

जिनके दाएँ हाथ में परशु है, और दूसरा दायाँ हाथ अभय मुद्रा में है, जिसमें ॐ अंकित है और जिसमें से कृपा की किरणें निकलकर मेरे ऊपर बरस रही हैं। 


गणेशजी के प्रथम बाएँ हाथ में कमल पुष्प एवं पाश है और दूसरे बाएँ हाथ में मधुर मोदकों का थाल है। 


ऐसे श्रीगणेशजी की अनुपम मंगलमय रूपमाधुरी का अपने नेत्रों के दोनों से पान करता हुआ मैं उनकी स्तुति करता हूँ।  



Ganesh Manas Puja 24. Ganesha Stotra & Stuti 

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